Chanakya Quotes In Hindi -चाणक्य

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Chankaya thoughts in hindi | chanakya Shlokas in Hindi

“पृथ्वी सत्य पे टिकी हुई है। ये सत्य की ही ताक़त है, जिससे सूर्य चमकता है और हवा बहती है। वास्तव में सभी चीज़ें सत्य पे टिकी हुई हैं।”

“फूलों की खुशबू हवा की दिशा में ही फैलती है, लेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई चारों तरफ फैलती है।”

“जो हमारे दिल में रहता है, वो दूर होके भी पास है। लेकिन जो हमारे दिल में नहीं रहता, वो पास होके भी दूर है।”

“ये मत सोचो की प्यार और लगाव एक ही चीज है। दोनों एक दूसरे के दुश्मन हैं। ये लगाव ही है जो प्यार को खत्म कर देता है।”

“दौलत, दोस्त ,पत्नी और राज्य दोबारा हासिल किये जा सकते हैं, लेकिन ये शरीर दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता।” ~ चाणक्य

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कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयं से तीन प्रश्न कीजिये – मैं ये क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल होऊंगा. और जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तभी आगे बढिए. चाणक्य

व्यक्ति अकेले पैदा होता है और अकेले मर जाता है; और वो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद ही भुगतता है; और वह अकेले ही नर्क या स्वर्ग जाता है. चाणक्य

भगवान मूर्तियों में नहीं है. आपकी अनुभूति आपका इश्वर है. आत्मा आपका मंदिर है. चाणक्य

अगर सांप जहरीला ना भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए. चाणक्य

इस बात को व्यक्त मत होने दीजिये कि आपने क्या करने के लिए सोचा है, बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाये रखिये और इस काम को करने के लिए दृढ रहिये. चाणक्य


शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है. शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है.

जैसे ही भय आपके करीब आये, उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये.

किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना.

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जब तक आपका शरीर स्वस्थ और नियंत्रण में है और मृत्यु दूर है, अपनी आत्मा को बचाने कि कोशिश कीजिये; जब मृत्यु सर पर आजायेगी तब आप क्या कर पाएंगे?

Chanakya चाणक्य

कोई व्यक्ति अपने कार्यों से महान होता है, अपने जन्म से नहीं.

Chanakya चाणक्य

सर्प, नृप, शेर, डंक मारने वाले ततैया, छोटे बच्चे, दूसरों के कुत्तों, और एक मूर्ख: इन सातों को नीद से नहीं उठाना चाहिए.

Chanakya चाणक्य

जिस प्रकार एक सूखे पेड़ को अगर आग लगा दी जाये तो वह पूरा जंगल जला देता है, उसी प्रकार एक पापी पुत्र पुरे परिवार को बर्वाद कर देता है.

Chanakya चाणक्य

सबसे बड़ा गुरु मन्त्र है : कभी भी अपने राज़ दूसरों को मत बताएं. ये आपको बर्वाद कर देगा.

Chanakya चाणक्य

पहले पांच सालों में अपने बच्चे को बड़े प्यार से रखिये. अगले पांच साल उन्हें डांट-डपट के रखिये. जब वह सोलह साल का हो जाये तो उसके साथ एक मित्र की तरह व्यवहार करिए. आपके वयस्क बच्चे ही आपके सबसे अच्छे मित्र हैं.

हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है. ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो. यह कड़वा सच है.

वेश्याएं निर्धनों के साथ नहीं रहतीं, नागरिक कमजोर संगठन का समर्थन नहीं करते, और पक्षी उस पेड़ पर घोंसला नहीं बनाते जिस पे फल ना हों.

सांप के फन, मक्खी के मुख और बिच्छु के डंक में ज़हर होता है; पर दुष्ट व्यक्ति तो इससे भरा होता है.

वह जो अपने परिवार से अत्यधिक जुड़ा हुआ है, उसे भय और चिंता का सामना करना पड़ता है, क्योंकि सभी दुखों कि जड़ लगाव है. इसलिए खुश रहने कि लिए लगाव छोड़ देना चाहिए.

He who lives in our mind is near though he may actually be far away; but he who is not in our heart is far though he may really be nearby.


वह जो हमारे चिंतन में रहता है वह करीब है, भले ही वास्तविकता में वह बहुत दूर ही क्यों ना हो; लेकिन जो हमारे ह्रदय में नहीं है वो करीब होते हुए भी बहुत दूर होता है.

अपमानित हो के जीने से अच्छा मरना है. मृत्यु तो बस एक क्षण का दुःख देती है, लेकिन अपमान हर दिन जीवन में दुःख लाता है.

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दुर्बल के साथ संधि ना करें।” ~ आचार्य चाणक्य

“किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।” ~ चाणक्य

“संधि करने वालों में तेज़ ही संधि का होता है।” ~ चाणक्य

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“कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।”

“संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहें।”

“शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें।”

“शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है।”

कभी भी उनसे मित्रता मत कीजिये जो आपसे कम या ज्यादा प्रतिष्ठा के हों. ऐसी मित्रता कभी आपको ख़ुशी नहीं देगी.

Chanakya चाणक्य

वो जिसका ज्ञान बस किताबों तक सीमित है और जिसका धन दूसरों के कब्ज़े मैं है, वो ज़रुरत पड़ने पर ना अपना ज्ञान प्रयोग कर सकता है ना धन.चाणक्य


जो सुख-शांति व्यक्ति को आध्यात्मिक शान्ति के अमृत से संतुष्ट होने पे मिलती है वो लालची लोगों को बेचैनी से इधर-उधर घूमने से नहीं मिलती.चाणक्य


एक अनपढ़ व्यक्ति का जीवन उसी तरह से बेकार है जैसे की कुत्ते की पूँछ, जो ना उसके पीछे का भाग ढकती है ना ही उसे कीड़े-मकौडों के डंक से बचाती है. चाणक्य

एक उत्कृष्ट बात जो शेर से सीखी जा सकती है वो ये है कि व्यक्ति जो कुछ भी करना चाहता है उसे पूरे दिल और ज़ोरदार प्रयास के साथ करे.

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सारस की तरह एक बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए और अपने उद्देश्य को स्थान की जानकारी, समय और योग्यता के अनुसार प्राप्त करना चाहिए.

“भाग्य के विपरीत होने पर अच्छा कर्म भी दु:खदायी हो जाता है।”

“शत्रु की बुरी आदतों को सुनकर कानों को सुख मिलता है।”

“चोर और राज कर्मचारियों से धन की रक्षा करनी चाहिए।”

“जन्म-मरण में दुःख ही है।”


जो लोग परमात्मा तक पहुंचना चाहते हैं उन्हें वाणी, मन, इन्द्रियों की पवित्रता और एक दयालु ह्रदय की आवश्यकता होती है. चाणक्य

“जैसे एक बछड़ा हज़ारो गायों के झुंड मे अपनी माँ के पीछे चलता है। उसी प्रकार आदमी के अच्छे और बुरे कर्म उसके पीछे चलते हैं।” ~ चाणक्य

“विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।” चाणक्य

“सबसे बड़ा गुरु मंत्र, अपने राज किसी को भी मत बताओ। ये तुम्हे खत्म कर देगा।” ~ आचार्य चाणक्य


फूलों की सुगंध केवल वायु की दिशा में फैलती है. लेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई हर दिशा में फैलती है चाणक्य


दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति नौजवानी और औरत की सुन्दरता है.


हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए; विवेकवान व्यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं.

“आदमी अपने जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान होता है।”

“एक समझदार आदमी को सारस की तरह होश से काम लेना चाहिए और जगह, वक्त और अपनी योग्यता को समझते हुए अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए।”

“ईश्वर मूर्तियों में नहीं है। आपकी भावनाएँ ही आपका ईश्वर है। आत्मा आपका मंदिर है।”

“पुस्तकें एक मुर्ख आदमी के लिए वैसे ही हैं, जैसे एक अंधे के लिए आइना।”

“एक राजा की ताकत उसकी शक्तिशाली भुजाओं में होती है। ब्राह्मण की ताकत उसके आध्यात्मिक ज्ञान में और एक औरत की ताक़त उसकी खूबसूरती, यौवन और मधुर वाणी में होती है।”

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“आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।”

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“गरीब धन की इच्छा करता है, पशु बोलने योग्य होने की, आदमी स्वर्ग की इच्छा करते हैं और धार्मिक लोग मोक्ष की।”

“जो गुजर गया उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतिंत होना चाहिए। समझदार लोग केवल वर्तमान में ही जीते हैं।”


जब आप किसी काम की शुरुआत करें, तो असफलता से मत डरें और उस काम को ना छोड़ें. जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं वो सबसे प्रसन्न होते हैं.

सेवक को तब परखें जब वह काम ना कर रहा हो, रिश्तेदार को किसी कठिनाई में, मित्र को संकट में, और पत्नी को घोर विपत्ति में.


हे बुद्धिमान लोगों ! अपना धन उन्ही को दो जो उसके योग्य हों और किसी को नहीं. बादलों के द्वारा लिया गया समुद्र का जल हमेशा मीठा होता है.


पृथ्वी सत्य की शक्ति द्वारा समर्थित है; ये सत्य की शक्ति ही है जो सूरज को चमक और हवा को वेग देती है; दरअसल सभी चीजें सत्य पर निर्भर करती हैं.

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“शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।” ~ आचार्य चाणक्य

“सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।”

“अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।”

“भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।”

“विद्या ही निर्धन का धन है।”

“शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।”

“अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।”

“सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।”
“संकट में बुद्धि भी काम नहीं आती है।”

“जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।”

“किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब ना करें।”

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“जैसे एक सूखा पेड़ आग लगने पे पुरे जंगल को जला देता है। उसी प्रकार एक दुष्ट पुत्र पुरे परिवार को खत्म कर देता है।” ~ आचार्य चाणक्य

“जिस आदमी से हमें काम लेना है, उससे हमें वही बात करनी चाहिए जो उसे अच्छी लगे। जैसे एक शिकारी हिरन का शिकार करने से पहले मधुर आवाज़ में गाता है।”

“वो व्यक्ति जो दूसरों के गुप्त दोषों के बारे में बातें करते हैं, वे अपने आप को बांबी में आवारा घूमने वाले साँपों की तरह बर्बाद कर लेते हैं।”

“एक आदर्श पत्नी वो है जो अपने पति की सुबह माँ की तरह सेवा करे और दिन में एक बहन की तरह प्यार करे और रात में एक वेश्या की तरह खुश करे।”

“वो जो अपने परिवार से अति लगाव रखता है भय और दुख में जीता है। सभी दुखों का मुख्य कारण लगाव ही है, इसलिए खुश रहने के लिए लगाव का त्याग आवशयक है।”

“एक संतुलित मन के बराबर कोई तपस्या नहीं है। संतोष के बराबर कोई खुशी नहीं है। लोभ के जैसी कोई बिमारी नहीं है। दया के जैसा कोई सदाचार नहीं है।” “ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।” ~

“किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ ना करें।”

“आलसी का ना वर्तमान होता है, ना भविष्य।”

“सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।”

“ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते हैं।”

“सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।”

“समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।”

“दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।” ~ चाणक्य

“चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।” ~ चाणक्य

“पहले निश्चय करिए, फिर कार्य आरम्भ करें।” ~ आचार्य चाणक्य

“भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।” ~ आचार्य चाणक्य

“अर्थ और धर्म, कर्म का आधार है।”

“शत्रु दण्ड नीति के ही योग्य है।” ~ आचार्य चाणक्य

“कठोर वाणी अग्नि दाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुँचाती है।” ~ चाणक्य

chanakya Slokas in Hindi

“व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।” ~ चाणक्य

“शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करें।” ~ चाणक्य

“अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता ना करें।” ~ चाणक्य

“मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।” ~ चाणक्य

“योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।”

“एक अकेला पहिया नहीं चला करता।” ~ चाणक्य

“अविनीत स्वामी के होने से तो स्वामी का ना होना अच्छा है।” ~ चाणक्य

“जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।”

“स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।” ~ चाणक्य

“धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।” ~ चाणक्य

“दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।”

“आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।”

“मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।” ~ चाणक्य

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“दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।” ~ चाणक्य

“दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।” ~ चाणक्य

“कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।”

“कल का कार्य आज ही कर लें।” ~ चाणक्य

“सुख का आधार धर्म है।” ~ चाणक्य

“अर्थ का आधार राज्य है।” ~ आचार्य चाणक्य

“राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।” ~ चाणक्य

“प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेता विहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।” ~ चाणक्य

“वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।” ~ चाणक्य

“वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।”

“ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।”

“आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।”

“जहाँ लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहाँ सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।”

“इन्द्रियों पर विजय का आधार विनम्रता है।”

“प्रकृति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।”

“शासक को स्वयं योगय बनकर योगय प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।”

“सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।” ~ चाणक्य

“स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करें।” ~ चाणक्य

“अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।” ~ चाणक्य

“ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाएँ।”

“समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिएं।” ~ चाणक्य

“विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त ना रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।” ~ आचार्य चाणक्य

“लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।”

“मन्त्रणा की संपत्ति से ही राज्य का विकास होता है।” ~ चाणक्य

“भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।”

“मंत्रणा के समय कर्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।”

“मंत्रणा रूप आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।”

“राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनों का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है।”

“कार्य-अकार्य के तत्व दर्शी ही मंत्री होने चाहिए।”

“छः कानों में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।”

“अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार हैं।”

“आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।”

“शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।”

“राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते हैं।” ~ आचार्य चाणक्य

“राजतंत्र से संबंधित घरेलू और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।”

“राजनीति का संबंध केवल अपने राज्य को समृद्धि प्रदान करने वाले मामलों से होता है।”

“ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।”

“चतुरंगणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।”

Chankaya motivational thoughts in hindi

“जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते हैं।”

“कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता।”

“अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।” ~

“अशुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए।” ~

“समय का ज्ञान ना रखने वाले राजा का कर्म समय के द्वारा ही नष्ट हो जाता है।” ~

“नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते हैं।” ~

“परीक्षा करने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।” ~

“मूर्ख लोग कार्यों के मध्य कठिनाई उत्पन्न होने पर दोष ही निकाला करते हैं।” ~

“कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए।” ~

“दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।” ~

“जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होता, उनके कार्य पुरे नहीं होते।” ~ चाणक्य

“प्रयत्न ना करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।” ~ चाणक्य

“जो अपने कर्तव्यों से बचते हैं, वे अपने आश्रितों परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते।” ~ चाणक्य

“जो अपने कर्म को नहीं पहचानता, वह अंधा है।” ~ चाणक्य

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“प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनों के अनुमान से कार्य की परीक्षा करें।” ~ चाणक्य

“निम्न अनुष्ठानों (भूमि, धन-व्यापारउधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते हैं।” ~ चाणक्य

“विचार ना करके कार्य करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।” ~ चाणक्य

मुर्ख लोगो से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से हम अपना ही समय नष्ट करते है.
आलसी मनुष्य का वर्तमान और भविष्य नही होता.

डर को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आ जाय तो इस पर हमला कर दो.

भगवान मूर्तियो मे नही बसता बल्कि आपकी अनुभूति ही आपका ईश्वर है और आत्मा आपका मंदिर.

भाग्य उनका साथ देता है जो कठिन परिस्थितयो का सामना करके भी अपने लक्ष्य के प्रति ढृढ रहते है.

जो तुम्हारी बात को सुनते हुए इधर-उधर देखे उस आदमी पर कभी भी विश्वास न करे
दूसरो की गलतियो से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने पर तुम्हारी आयु कम पड़ जायेंगी.

कोई भी व्यक्ति ऊँचे स्थान पर बैठकर ऊँचा नहीं हो जाता बल्कि हमेशा अपने गुणों से ऊँचा होता है.

बुद्धि से पैसा कमाया जा सकता है,पैसे से बुद्धि नहीं.

दण्ड का डर नहीं होने से लोग गलत कार्य करने लग जाते है

बहुत से गुणो के होने के बाद भी सिर्फ एक दोष सब कुछ नष्ट कर सकता है.

दुश्मन द्वारा अगर मधुर व्यवहार किया जाये तो उसे दो

किसी भी अवस्था में सबसे पहले माँ को भोजन कराना चाहियें.ष मुक्त नही समझना चाहिए.