उंगलिया यु ना सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो
जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे बारिशो में पतंगे उडाया करो
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर नीम कि पत्तियों को चबाया करो
शाम के बाद जब तुम सहर देख लो कुछ फकीरों को खाना खिलाया करो
चाँद सूरज कहा, अपनी मंजिल कहा ऐसे वैसो को मुह मत लगाया करो
घर उसी का सही तुम भी हक़दार हो, रोज़ आया करो रोज़ जाया करो।- राहत इंदोरी
Ungliya u n sab par uthaya karo
kharch karne se pahle kamaya karo
zindgi kya hai khud hi samajh jaoge barisho me patange udaya karo
dosto se mulakat ke naam par neem ki pattiyo ko chabaya karo
shaam ke baad jab tum sahar dekh lo kuch faqiro ko khana khilaya karo
chaand suraj kaha, apni manzil kaha aise waise ko muh mat lagaya karo
ghar usi ka sahi tum bhi hakdar ho, roz aaya karo, roz jaya karo
Rahat Indori
Rahat Indori Islami Shayari in hindi
जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है
जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है
मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है
सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है
जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है
ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है
बुलाती है मगर जाने का नईं
बुलाती है मगर जाने का नईं ये दुनिया है इधर जाने का नईं
मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर मगर हद से गुजर जाने का नईं
सितारें नोच कर ले जाऊँगा मैं खाली हाथ घर जाने का नईं
वबा फैली हुई है हर तरफअभी माहौल मर जाने का नईं
वो गर्दन नापता है नाप ले मगर जालिम से डर जाने का नईं
राहत इंदौरी की ग़ज़लें
मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ
मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ
कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत मेंऔर तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ
मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ
तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज हैमैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूँ
याद आता है के पहले भी कई बार यूं हीमैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूँ
ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था
ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला थामैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था
तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था
बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा मेरा जहाज़ ज़मीन पर उतरने वाला था
मेरा नसीब मेरे हाथ काट गए वर्ना मैं तेरी माँग में सिंदूर भरने वाला था
मेरे चिराग मेरी शब मेरी मुंडेरें हैं मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था
राहत इंदौरी इस्लामी गजल
हाथ खाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते,
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते,
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है,
उम्र गुजरी है तेरे शहर में आते जाते।
Haath Khali Hain Tere Shehar Se Jaate-Jaate,
Jaan Hoti Toh Meri Jaan Lutate Jaate,
Ab Toh Har Haath Ka Pathar Humein Pehchanta Hai,
Umar Gujri Hai Tere Shehar Mein Aate Jaate.
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